Saturday, August 25, 2012

एक गुमनाम लेखक की डायरी-6

दूर देश एक शहर में एक परी उदास है..। उदास और बिमार। यहां इतनी दूर से सिर्फ उसकी लड़खड़ाती आवाज सुन पाता हूं। तकनीक ने बस इतनी भर सुविधा पदान की है हमें।
दुख की एक घायल चिड़िया बार-बार उस शहर की दिशा में उड़ती है और वापिस चली आती है। 
कहने को हम आजाद हैं लेकिन हमने स्वयं को कितनी-कितनी जंजीरों में बांध रखा है। 
 एक साथ कई-कई उदासी, कितने दुख और कितने-कितने अकेलेपन को साथ लिए जीने के अभ्यस्त हो चुके हैं हम..।

कभी-कभी मैं शिद्दत से सोचता हूं कि कि शब्द नहीं होते और कविता का आसरा नहीं होता तो हमारे जैसे लोग कहां जाते...किसकी शरण में..।

हमारा जीना ही तो शामिल है कविता में..। हम जो जीते हैं वही कविता है...और कुछ भी  तो नहीं....।


Thursday, August 23, 2012

एक गुमनाम लेखक की डायरी - 5


24.08.2012, शुक्रवार

कल किसन कालजयी से मिला। वहीं हितेन्द्र पटेल और आशुतोष जी भी थे। किसन कालजयी ने मेरी कविता की किताब प्रकाशित की है। हम पहली बार मिल रहे हैं- किसन जी ने कहा। अच्छा, आप मिले नहीं कभी और आपने विमलेश जी कि किताब छाप दी। यानि हिन्दी साहित्य में यह भी होता है, यह बात हमें आश्वस्त करती है - आशुतोष जी की आंखों में विस्मय था। 

उन्हें कॉफी हाउस जाना था। लेकिन मैं नहीं गया। संकोचवश । अतुल जी से मिलना भी था और जल्दी घर लौटना था। कॉलेज स्ट्रीट से लौटने में मुझे डेढ़ घंटे लगने थे।

मैं महत्मा गांधी रोड के फूटपाथ से लौट रहा था।  सामने एक सीडी बेचने वाला दिखा। मैंने कुछ सोचते हुए उससे पूछा - रवीन्द्रनाथ के गीत हैं हिन्दी में। वह समझा नहीं - उसने फिर पूछा - किसका? मैंने फिर वही दुहराया - रवीन्द्रनाथ टैगोर के गीत।  क्या कहा आपने रवीना टंडन के गीत? - वह बोला। मैं बहुत उदास हो गया और बिना कुछ जवाब दिए फूट-पाथ पर आगे बढ़ गया।

मैं कोलकाता में था। और सोच रहा था कि जिस तरह रवीन्द्र को यहां के लोग पूजते हैं, उससे तो उस आदमी को रवीन्द्रनाथ का नाम मालूम होना चाहिए था। लेकिन उसे शायद नहीं मालूम था।  इस देश की बिडंबना क्या रही। बांग्ला में फिर भी रवीन्द्र को तो लगभग सबलोग जानते हैं, लेकिन क्या हिन्दी भाषा में निराला और प्रसाद को लोग उसी तरह जानते हैं। क्या कभी यह हो पाएगा इस देश में कि हम साहित्य को  भी जीवन की जरूरी चीजों का हिस्सा बनाएंगे।

हिन्दी भाषा के संदर्भ में कहूं तो मुझे बार-बार लगता है कि हिन्दी साहित्य का जिस तरह विकास हुआ उसी अनुपात में हिन्दी पट्टी के लोगों  में साक्षरता और उससे भी अधिक साहित्यिक साक्षरता का विकास नहीं हुआ। इसके बहुत सारे कारण हो सकता है, गुरूओं ने गिनाए हों, मुझे इसकी जानकारी नहीं है। 

लेकिन यह जरूरी था कि साहित्य के विकास के साथ आम आदमी की शिक्षा और उसके मानसिक सोच में विकासात्मक परिवर्तन होता। लेकिन यह न हो सका। और आज भी यह हो नहीं सका है। साहित्यकार आज भी हिन्दी पट्टी के समाज में एक अजूबा चीज है। कवि जी है। हिन्दी पट्टी में व्यंग्यात्मक लहजे में कहा जाता है कि कविजी आ रहे हैं।

नहीं तो क्या कारण है कि बचपन से ही मेरे मन में ये बात बैठी हुई थी कि और कुछ भी बनना है, लेकिन कवि नहीं बनना है। अगर ऐसा हुआ तो मेरा नाम भूलकर लोग मुझे भी कविजी कहना शुरू कर देंगें। और यह कविजी कहने के बाद दांत निपोर कर ऐसे हंसेंगे जैसे कह रहे हों कि साले तुम निकम्मे हो, इसलिए कवि बने फिरते हो। 

यही कुछ कारण रहे होंगे जब होश आया तो मैंने उपन्यास अधिक पढ़े। और पहली बार जब लिखना शुरू किया तो उपन्यास ही लिखना शुरू किया। यह अलग बात है कि वह उपन्यास गुलशन नंदा और वेद प्रकाश शर्मा और सरला रानू के उपन्यासों के प्रभाव का नतीजा था। जिस डायरी में वह उपन्यास लिखा जा रहा था, और जिसके  आठ अध्याय पूरे हो चुके थे, वह कहीं खो गई है। 

कविता बहुत अच्छी हो सकती है यह मुझे सीमा विजय की अवृति ने बहुत जमाने बाद कॉलेज के दिनों में सिखाया। उसने अवतार सिंह पाश की एक कविता की अवृति की थी और मैं अंदर तक झनझना गया था। वह मेरे कॉलेज का पहला दिन था। एक और कविता की आवृति वह करती थी - कभी मत करो माफ। यह कविता सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की थी। 

इन दो कविताओं की अवृति ने फिर से मुझे झंकझोर कर कविता की दुनिया में वापसी की।  बाद में तो इससे ऐसे जुड़ा कि अब चाहकर भी निकलना संभव नहीं है। मेरे अंदर जब तक एक आदमी जिंदा है जो रोते हुए अपने गांव से इस महानगर में आया था, तब तक मुझे विश्वास है कि मेरे अंदर की कविता नहीं मरेगी। इसकी परवाह मुझे नहीं है कि लोग मुझे कवि समझेंगे या मेरे लिखे को कविता समझा जाएगा कभी। लेकिन एक विवशता जो मेरे साथ हो ली है। उससे दूर होना अब लगभग नामुंकिन लगता है।

एक मित्र की बात याद आती है - वह जमाना गया कि लोग कवियों कलाकारों को अमर बनाते थे, अब अमरता वाला मुहावरा खो गया है, इसलिए जो कवि खुद को अमर करने के लिए लिखता है, वह चुतिया है।

आज उसकी वह बात याद आ रही है - बेतरह । और याद आ रहे हैं रवीन्द्र, निराला और साथ में उस दुकानदार की बात - रवीना टंडन...।

एक गुमनाम लेखक की डायरी-4

20.08.2012 - बृहस्पतिवार

अजब दिन थे वे। अजब देश। 

खेत-बधार और गली-गांव से अधिक की पहुंच नहीं थी हमारी। कभी-कभी छुपकर दोस्तों के साथ नदी चले जाते थे। वह भी क्यों, इसलिए कि जोशोप को बहुत सारे गीत याद थे। वह घास गढ़ता था और अपने दोस्तों के साथ भैंस चराता था। हीरालाल भी बहुत अच्छे गीत गाता था। उनके साथ हम बच्चों की टोलियां गाते- बजाते  नदी की ओर भैंस धोने के लिए जाते। मैं नदी के किनारे खड़ा रहता। सारे बच्चे अपने अपने कपड़े उतार कर नदी में उतर जाते। एक दिन मैं नदी में उतरा और मेरे सारे कपड़े गीले हो गए। फिर भिगे हुए कपड़े पहने ही मैं कई घंटे बाहर ही घूमता रहा ताकि कपड़े सूख जाएं तो घर जाऊं। गीले कपड़े के कारण नदी जाने की बात घर वालों को पता चल जाती और मेरा आपने दोस्तों के साथ की चल रही करामातों पर पाबंदी लग जाती। कपड़े सूख गए लेकिन सिर पर पानी ने अपने निशान छोड़ रक्खे थे। मां को पता चला तो उसने बहुत डांट लगाई। लेकिन नदी जाना नहीं रूका। 

एक बार मैं नदी में डूबने लगा। अंतिम बार लगा कि अब मैं मर जाऊंगा, अब फिर मेरी वापसी नहीं होगी। लेकिन मेरी एक ताकत मेरी जिद भी है। जिद में आकर मैंने अंतिम प्रयास किया और तैरता हुआ किसी तरह किनारे तक पहुंचा। उसदिन लगा कि मैं तैर सकता हूं, लेकिन गहराई में जाने में अज भी मुझे डर लगता है।



वह नदी अब सूख-सी गई है। वहां लोग अब नहाने नहीं जाते। औरतें अपने कपड़े फिंचने नहीं जाती। बालकिशुन मल्लाह अब नाव से नदी पार कराने के एवज में अनाज मांगने नहीं आते। अब नदी उदास-उदास दिखती है। हमारे जवान होने तक वह अब बूढ़ी हो चुकी है। नदी मर रही है और हम सिर्फ उसे देख भर रहे हैं। वह धर्मावती नदी जब नहीं रहेगी तो मैं अपने बच्चों से कहूंगा कि यहां एक नदी बहा करती थी और हमारे उस कहने की पीड़ा को शायद उस समय मेरे बच्चे नहीं समझेंगे।

गंगा जी दूर थीं जिसे हमारे बाबा भागड़ कहते थे। गंगा नदी हमें छोड़कर चली गई थीं और अब भागड़ रह गया था। गंगा जी के भाग जाने के कारण शायद उसका नाम भागड़ पड़ा था। हमारे बार वहीं उतरे थे। नदी को मापने के लिए बाध की रस्सी पकड़ हम गंगा के उस पार पहली बार गए थे । हम और मेरे बड़े भाई। मल्लाह से कहकर हमने गंगा के बीच में झिझिली खेली थी। बहनों ने गीत गाया था - मल्हवा रे तनिए सा झिझिली खेलाउ -। .. पूरी नौका गांव की औरतों से भरी हुई थी और पानी के बीच में गीत गूंज रहा था। वह गीत आज भी कभी-कभी मेरे कानों में गूंजता है. आज जब उस गंगा के किनारे से गुजरता हूं तो अनायास ही मेरे हाथ प्रणाम की मुद्रा में उठ आते हैं। मैं खुद को अब तक रोक नहीं पाया। रोकने की कोशिश भी नहीं की।

वह गंगा नहीं थी। गंगा का पानी सिर्फ बाढ़ के समय सावन-भादो में आता था। लेकिन पूरे साल हमारे लिए वही गंगा नदी थी। हमारी सारी रश्में वहीं होती थीं। मुर्दे फूंके जाते थे। तीज-जिऊतिया में औरते उसी के किनारे गीत गाते हुए-नहाते हुए अपने व्रत-उपवास पूरा करती थीं। उसी के किनारे कथा का आयोजन होता था। कई बार चईता-बिरहा और दुगोला का भी आयोजन होता।

वह गंगा नहीं थी लेकिन लोग उसे गंगा की तरह ही पूजते-आंछते थे। वह भागड़ भी अब सूखने के कगार पर है। और हम उसे सूखते मिटते हुए देख रहे हैं। मैं हर बार मन ही मन उस गंगिया माई को प्रणाम करता हूं। उसने हमें पानी दिया। हमें तैरना सिखाया। हमसे बेघर होकर भी कैसे रहा जाता है, वह सिखाया। यहां हुगली को रोज पार करता हूं, लेकिन वह श्रद्धा वह हूक मेरे मन में नहीं उठती जो उस सूख रही गंगा के लिए उठती है। 

कविता कहीं नहीं थी।  बस यही सब था जो जमा पूंजी था। आज भी कथा-कहानी के नाम पर वही सब है जिसे मैं हर रोज घर में या घर से निकलने के बाद जतन से बटोरता चलता हूं...।

Tuesday, August 21, 2012

एक गुमनाम लेखक की डायरी - 3

पहली-दूसरी -तीसरी कविताओं से होते हुए असंख्य कविताओं तक का सफर जारी हुआ। लेकिन यह बहुत बाद की बात है। इसके पेश्तर  रामनरेश त्रिपाठी की प्रार्थना, मैथेलीशऱण गुप्त की गौरव भरी कविताएं - इससे ज्यादा क्या था मेरे पास। एक सत्यनारायण लाल थे जिनका नाम बार-बार पढ़ने में आता था। 

हमने नहीं जाना कभी तब कि कार्टून की किताबें होती हैं। चंदा मामा जैसी किताबें होती हैं, जिन्हें बच्चे पढ़ते हैं। हमारे पास जो किताबें थीं वे कक्षा के लिए जरूरी थीं। आलावा इसके हनुमान चालिसा, सत्यनारायण व्रत कथा जैसी किताबें। एक किताब और थी जिसका जिक्र मैं बार-बार करता हूं - वह थी रामचरित मानस। 

समय-समय पर गीत गवनई और उसमें गाए जाने वाले रामायण और महाभारत के प्रसंग थे। विदेसिया नाच था और उसमें नाचने वाले लौंडों के द्वारा विरह के गाए हुए गीत थे, जोकर था जो अपनी अदाओं से हंसाता था। सत्ती ब्हुला का नाटक था, रानी सारंगा और सदावृक्ष जैसी किताबें थीं जिसे लय में हम बहनों के साथ गाया करते थे। गांव में हर समय गूंजने वाले मेहररूई गीत थे - गीत में पीड़ा थी, हंसी थी और वह सबकुछ था  और तब हमारा मन इन्ही सबको जीवन समझता था।

कविता कहां थी।  हरिजन बस्तियों में गाये जाने वाली सिनरैनी थी जिसमें  रविदास के पद गाए जाते थे। तब रविदास का पता नहीं था कि कौन थे। कबीर की उक्तियां थीं जिन्हें हम साधु-संत समझते थे। गोरखपंथी साधुओं द्वारा सारंगी पर गाए हुए गीत थे जिन्हें सुनते हुए मैं पूरे दिन गांव-गांव भटकता रहता था।  

आज मैं सोचता हूं तो लगता है कि इन्ही सब चीजों के बीच चुपके से कविता मेरे अंदर कहीं प्रवेश कर रही थी। और मैं उससे अनजान आपने में मगन एक ऐसी यात्रा कर रहा था जिसकी पगडंडियां यहां तक आती थीं जहां मैं खड़ा हूं। 

आज मन में यह प्रश्न लिए कि कहां खड़ा हूं मैं !!

Monday, August 20, 2012

एक गुमनाम लेखक की डायरी - 2

21.08.2012, मंगलवार

पहली कविता जो याद रह गई मन में उसे कैसे याद करूं - बहुत दूर समय की गहराइयों में जाकर एक बच्चे से पूछता हूं तो वह कहता है - घूघुआ मामा उपजे ले धान्हा। मैं उससे उसका अर्थ पूछता हूं तो वह लजाकर भाग जाता है। घर के कोने से मुझे देखता हुआ जोर-जोर से चिल्लाता हुआ गाता है - कितना पानी घोघो रानी। 

मैं उन गीतों की अर्थ गहराईयों में खो जाता हूं। मुझे कुछ भी हासिल नहीं होता। मुझे  आजी की आवाजें घेर लेती हैं। वह गा रही हैं मुझे अपने पैरों पर झूला झुलाते हुए - घुघुआ मामा उपजे ले धान्हा।

कविता से परिचय के पहले साधन ये ऐसे गीत बनते हैं जिनके अर्थ मुझे अब तक नहीं मालूम। जिन गीतों के अर्थ मालूम हैं वो अब समृतियों से गायब होते जा रहे हैं। वे तमाम गीत जो जांत चलाते हुए आजी और उनके साथ की औरते गातीं थीं। सोहनी करते हुए निठाली बहु और उनकी सहेलियां गाती थीं। नीम के झूले पर झूलती हुई गांव की लड़कियां गाती थीं। मचान पर जनेरा की बालियों की रखवाली करते हुए भरत भाई गाते थे। या बाबा को रात में जब नींद नहीं आती थी तो कभी कभी वे गुनगुनाते थे। मेरी नींद खुलती तो नींद में खलल डालती हुई अनेकों आवाजें मेरे कान में गूंजती थीं। उन तमाम गीतों को याद करते हुए मैं उनके ऋण को महसूस कर रहा हूं जो मेरी पीठ पर आज भी लदा है। 

कविता में पहली बार प्रवेश करता हूं तो मेरे सामने तितली-सूरज या  ईश्वर और देश से ज्यादा कुछ दिखाई नहीं पड़ता। कभी दूर देस से आती हुई कोई तितली अपने चंचल पंख हिलती है या स्कूल में होने वाली प्रर्थना अगम अखिलेश हे स्वामी  गूंजती-सरसराती निकल जाती है। 

मैं जब भी कोई कविता लिखने बैठता हूं मेरे सामने कोई शब्द नहीं होता। किसी वाक्य संरचना की कोई भूमिका नहीं होती। बहुत दूर समय के पार से आती हुई वे आवाजें होती हैं जो वर्तमान से टकरा कर एक नई धुन एक नई तरह की पीड़ा की रचना करती हैं।

एक शब्द लिखने के पहले मुझे मेरे बाबा के पसीने से भीगे हुए मटमैले कपड़े याद आते हैं। पिता की  पसीने के दाग से धवल पड़ गई सिपाही की वर्दी याद आती है। मां के पेट का दर्द याद आता है, जो अब तक जारी है। मेरी वे बहनें याद आती हैं जो कभी स्कूल नहीं गईं। मेरे बड़े भाई याद आते हैं जिनसे बेहद प्यार करते हुए भी उन्हें बचाया नहीं जा सका। रामचरित मानस की वह फटी-पुरानी पोथी याद आती है जो बिना दरवाजे के आलमारी में रखी जाती थी और कभी-कभी गाय के गोबर के छींटे उसपर पड़ जाते थे।

मैंने उस पोथी से बहुत सारे शब्द सीखे। और कई-कई बार उसे टिकुराई से सीता रहा। उसे बचाता रहा। और अंत में वहीं उसी आलमारी में छोड़कर इस महानगर में चला आया। मुझे फिर कभी वह पोथी नहीं मिलनी थी। मुझे एक कमरे में बंद हो जाना था और रोना था जी भर-भर अपने गांव की पगडंडियों खेतों और बाग-बगीचों के लिए। मेरे पास दीवारें थीं जिनके चारों ओर अंधेरा था। और बीमारी से तड़पती हुई मां थी । एक पिता थे जिनके माथे पर चिंता की रेखाएं गहरी होती जाती थीं। मेरे भाई बहन थे जिनके लिए मुझे भात और रोटी बनाना सीखना था।

नादानियों का समय कहीं बहुत पीछे छूट गया था। जिसको पाने के लिए सालों साल हमने कैलेंडर के पन्ने रंगे थे। और  शब्दों  के साथ हमारी दोस्ती की शुरूआत हो रही थी। हलांकि शब्द कम थे और हमारी भूख उससे कहीं बहुत ज्यादा। शब्दों के बदले हमें रोटियां खानी पड़तीं। रोटियों के बदले हमें कुछ भी हासिल नहीं था।

हम बदल रहे थे। लेकिन हमें उस बदलाव की जानकारी नहीं थी। सचमुच हम उस समय अनपढ़ थे और गंवार। हमें अंग्रेजी की एबीसीडी नहीं आती थी। और उन साथियों से हम रश्क करते थे जो अंग्रजी में बिना रूके कविताएं पढ़ते जाते थे।

कुल मिलाकार हमारे पास वे गीत थे जो हम अपने गांव से लेकर आए थे। समृतियां थीं जिनके लिए हम रात-दिन तड़पते रहते थे।

Sunday, August 19, 2012

एक गुमनाम लेखक की डायरी-1


 20.08.2012, सोमवार, लिलुया

पंन्द्रह साल पहले की डायरी खो गई है। क्या होगा उसमें की जिज्ञासा लिए पूरे घर में चहलकदमी करता हूं। कोने-कतरे में ढूंढ़ता हूं अपने वे शब्द जो तब लिखे गए जब शब्दों की महिमा तक से मन अनजान था। कुछ भी नहीं मिलता। कागज के टुकड़ों पर लिखी कुछ कविताएं मिलती हैं, जिन्हें आज ठीक तरह कविता भी नहीं कह सकता। निराशा की एक झीनी चादर घर के फर्श पर ही बिछ जाती है। मैं थोड़ा आराम करना चाहता हूं ताकि नई ऊर्जा से अपने छूट गए शब्दों की तलाश कर सकूं।

वे ढेरों कविताएं याद आती हैं जिन्हें लिखते हुए ऐसा नहीं सोचा कि ये कविताएं हैं कि कभी लोग इन्हें पढ़ेंगे। घर की संवादहीनता। दोस्त-साथी के  न होने की सूरत में मैं अपनी बात वहीं कह सकता था। वहीं कहा मैंने। बिना यह सोचे कि कहने के बाद न सांस लेने वाले कागज कुछ नहीं बोलेंगे, सह लेंगे मेरा सबकुछ कहा। अच्छा- बूरा, हंसी-खुशी, उदासी-रूलाई सब सह लेंगे एकदम चुप।

वे कागज के टुकड़े जिन्होंने इतना साथ दिया, उन्हें भूलूं भी तो कैसे। वे छूट गए गांव की पगडंडियों की तरह याद आते हैं। उन रस्सियों के झूले की तरह याद आते हैं जो नीम के पेड़ पर लटका छोड़ आए थे हम यहां इतनी दूर। कोलकाता..। यहां आकर एक सरकारी क्वार्टर में बंद हो गई थीं हमारी सांसें। कहीं कुछ भी नहीं। अखबार नहीं। टी.वी. नहीं। सिर्फ हिन्दी की पाठ्य पुस्तकें जो पढ़-पढ़कर ऊब गए थे।

याद आती है वह नदी जिसकी देह पर लिखते थे उस समय की सबसे खूबसूरत लड़की का नाम। उस पेड़ की याद आती है जिसमें खुदे थे ककहरा... और कई ऐसी रेखाएं खुदी थी जिनके अर्थ सिर्फ हम ही जानते थे।

ऐसी कविताएं जो हमारी आत्मा पर लिखे थे समय ने। हमारी देह पर स्कूल के मास्टरों ने। हमारे मन पर घर के बुजुर्गों ने। उन सबको लेकर आए थे यहां इस महानगर में शब्दों को खोजने। पिता की नजरों में उन शब्दों को खोजने जिनसे आदमी बनता है कोई एक। पर अपनी नजरों में हम उन शब्दों को खोज रहे थे जिनसे आदमी को सचमुच के आदमी की शक्ल में ढलने में मदद मिलती है। 

हम कोई विशिष्ट नहीं थे। हमें भी रोना आता था। कभी-कभी हंसते थे हम भी जोर-जोर। कोई एक पुराना लोक गीत जोर-जोर से गाकर सोचते थे कि हमारे सामने हजारों लोग खड़े हैं और हमारे गाने पर हो रहे हैं मोहित।

आज पता नहीं क्यों वह छुटा हुआ समय याद आ रहा है।  आइए रहते हैं साथ कुछ दिन। देखते परखते हैं। अपने गुमनामी पर हंसते हैं कुछ लम्हा...। फिक्र को उड़ाते हैं गुब्बारे की तरह। आइए कि फिर से जिंदा होते हैं कुछ लम्हा अपने होने के साथ....।

Tuesday, August 14, 2012

बकलम खुद


मेरा जन्म ऐसे परिवेश में हुआ जहां लिखने-पढ़ने की परम्परा दूर-दूर तक नहीं थी। कहने को हम ब्राह्मण थे, लेकिन मेरे बाबा को  क  भी लिखने नहीं आता था, शायद यही वजह है कि पुरोहिताई का काम मेरे परिवार से कभी नहीं जुड़ा। लेकिन अनपढ़ होने के बावजूद बाबा को तुलसी दास की चौपाइयां याद थी। गांव में जब भी गीत-गवनई होती – और उसमें अक्सर रामचरित मानस के छन्द ही गाए जाते – मैंने हमेशा देखा था कि बिना पुस्तक देखे बाबा छन्द गाते चले जाते थे, मेरा चुप-चाप उनके पीछे बैठना और गाते और झाल बजाते हुए उनकी हिलती हुई पीठ और उसपर रखा गमछा जरूर याद आते हैं।
मुझे स्वीकार करना चाहिए कि कविता से मेरा पहला परिचय यहीं से होता है – बाद में जब मुझे अक्षरों का ज्ञान हुआ तो बाल भारती के अलावा जो पुस्तक सबसे ज्यादा आकर्षित करती थी वह रामचरित मानस ही थी – मैं सबकी नजरें बचाकर ( यह संकोचबस ही था शायद) उस भारी-भरकम पुस्तक को लेकर किसी घर में बैठ जाता था और लय और पूरी तन्मयता के साथ गाता चला जाता था – श्री राम चन्द्र कृपालु भजुमन....

बचपन गांव में बीता। लेकिन एक दिन बाबा को लगा कि यह लड़का नान्हों की संगत में पड़कर बिगड़ रहा है। उस समय मेरे मित्रों में ज्यादातर लड़के ऐसे थे जिन्हें उस समय की गंवई भाषा में चमार-दुसाध और मियां कहा जाता था। उन दोस्तों के साथ अक्सर मैं भैंस चराने निकल जाता, घांस काटता, नदी नहाता और उनके घर खाना भा खा लेता था। बाबा पढ़े-लिखे नहीं थे लेकिन उनके अन्दर ब्राह्मणत्व कूट-कूट कर भरा हुआ था। सो उन्होंने मेरे पिता को आदेश दिया कि इसे यहां से हटाओ नहीं तो यह लड़का हाथ से निकला जाता है।

इस तरह गांव छुटा – या छुड़ा दिया गया। लेकिन गांव, खेत, बगीचे और दोस्तों के लिए मैं कितना रोया – कितना रोया, आज उस छोटे बच्चे के बारे में सोचता हूं और उसका रोना याद आता है तो मेरी आंखें आज भी नम हो जाया करती हैं। अपने गांव से दूर मुझे कोलकाता भेज दिया गया था आदमी बनने के लिए। पंडी जी का पहाड़ा और शहर कविता उस याद की एक हल्की तस्वीर पेश करती है।

कविताओं की दुनिया ने हमेशा से ही आकर्षित किया। स्कूल में पढ़ते हुए सबसे पहले हिन्दी की किताब ही खत्म होती थी। खत्म होने के बाद भी बार-बार पढ़ी जाती थी- जब मन भर जाता तो बड़े भाई की हिन्दी की किताब पर भी हाथ साफ किया जाता रहा। यह क्रम लगभग दसवीं कक्षा तक बदस्तुर जारी रहा। 10 वीं कक्षा तक सबसे अधिक प्रभावित करने वाले कवियों में निराला, दिनकर और गुप्त जी रहे। एच.एस. में आने के बाद पहली बार नागार्जुन और अज्ञेय जैसे कवियों से पाला पड़ा। वैसे अज्ञेय की एक कविता दसवीं में पढ़ चुके थे – मैने आहूति बनकर देखा। वह कविता तब की कंठस्थ हुई तो आज भी पूरी याद है।

मैं इतना संकोची स्वभाव का रहा हूं कि कभी-भी किसी शिक्षक से यह नहीं पूछा कि और क्या पढ़ना चाहिए। ले-देकर पिता थे जो दिनकर का नाम जानते थे और दिनकर की रश्मिरथि उन्हें पूरी याद थी। फल यह हुआ कि रश्मिरथि मुझे भी लगभग याद हो चली।

कॉलेज में पहली बार सर्वेश्वर दयाल सक्सेना से परिचय हुआ। उनकी कई कविताएं याद हो गईं। लेकिन सबसे ज्यादा निकट जो कवि लगा, वह थे केदारनाथ सिंह। उनकी जादुई भाषा और गांव से जुड़ी उनकी कविताएं बिल्कुल अपनी तरह की लगती थीं। पहली बार लिखने का साहस केदारनाथ सिंह को पढ़ते हुए ही हुआ। कविताएं लिखना तो बहुत समय से चल रहा था लेकिन कविताएं कैसी हैं, यह कौन बताए। अपनी लिखी हुई रचना किसे पढ़ाई जाय। यह समस्या बहुत दिन तक बनी रही। इसके बाद कई मित्र मिले जो लिखने को साध रहे थे। निशांत बाद में चलकर बड़े अच्छे मित्र बने। प्रफुल्ल कोलख्यान और नीलकमल से बातें होने लगीं तो लगा कि अभी बहुत कुछ करना बाकी है।
इसके बाद लगभग हर समकालीन कवियों को पढ़ा। एक-एक संग्रह खरीद-खरीद कर के। बांग्ला की कुछ कविताएं भी भाई निशांत के सौजन्य से पढ़ने को मिलीं।

पहली बार 2003 में वागर्थ में तीन कविताएं छपी। इसके बाद छपने का सिलसिला जारी रहा। इस बीच मानसिक परेशानियां भी खूब रहीं। मनीषा मेरे साथ ही पढ़ती थी और हम एक दूसरे को पसंद करने लगे थे। घर वालों को यह बात नागवार गुजरी थी और काफी जद्दोजहद और संघर्ष के पश्चात ही हमारी शादी हो सकी। मेरी कविताओं में उस संघर्ष की झलक मिलती है।

2006- से 2009 तक लगभग तीन साल तक मैने लिखना पढ़ना बंद कर दिया था। मुझे लगा कि ऐसे माहौल में कोई कैसे लिख सकता है। मेरे व्यक्तिगत जीवन में कुछ ऐसी घटनाएं घटित हुईं .. साथ ही साहित्यिक जीवन में भी कि मैंने कसम खा ली कि अब लिखना पढ़ना सब बंद। लेकिन बाद में पता चला कि लिखने-पढ़ने के बिना मैं रह ही नहीं सकता। कि लिखने के बिना मेरी मुक्ति नहीं है। और मैं फिर लौटकर आया। इस बीच कोलकाता में उदय प्रकाश के साथ काव्य-पाठ हुआ, उन्होंने कविताओं की दिल से तारीफ की और कहा कि आपको लिखते रहना चाहिए। मेरे लिखने की तरफ लौटाने में भाई निशांत की भूमिका को मैं कभी नहीं भूल सकता। इसी वर्ष लिखना शुरू किया और इंटरनेट को भी साधना शुरू किया। अब सोच लिया है कि कुछ भी लिखूं वह सार्थक हो। इस लिखने के क्रम में कुछ भी सार्थक लिख पाया तो समझूंगा कि एक श्राप से मुझे मुक्ति मिली और साहित्य और समाज को कुछ ( बहुत छोटा अंश) मैं दे सका।

कविताओं में लोक और खासकर गांवों की स्मृतियां ज्यादा हैं। गांव से बचपन में खत्म हुआ जुड़ाव गहरे कहीं बैठ गया था और बार-बार मेरी कविताओं में वह उजागर हो जाता था। बहुत सारी कविताएं गांव की पृष्ठभूमि पर लिखी गई हैं और कई कविताओं में गांवों के ठेठ शब्दों का इस्तेमाल भी मैने किया है।

यह भी सही है कि अपनी कुछ ही कविताएं मुझे अच्छी लगती हैं। अभी जो कविताएं लिखी जा रही हैं, उनमें अधिकांश कविताएं मुझे स्पर्श नहीं करती लेकिन कई एक कविताएं झकझोरती भी हैं। मुझे हमेशा लगता है कि अबी मैं कविताएं लिखना सीख रहा हूं। लगभग 15 साल से लागातार लिखता हुआ मैं कभी तो किसी कविता या किसी कहानी से संतुष्ट हो पाता!!. यह अवसर अब तक नहीं आया है... कविताओं के कुछ अंश अच्छे लगते हैं पूरी कविता कभी नहीं।
एक और बात मुझे कहनी ही चाहिए। कई बार लोग कहते हैं कि तुम इस समय के लायक नहीं हो, तुम बहुत सीधे हो। ऐसे समय में तुम कैसै टिक पाओगे। तुम्हे थोड़ा समय के हिसाब से चालाक बनना चाहिए। लेकिन मैं बन नहीं पाता। मुझे बार-बार लगता है कि जिस दिन मैं चालू बन जाऊंगा, या समय के अनुरूप खुद को चालाक बना लूंगा उसी दिन मेरा लेखक मर जाएगा। इसलिए मैं जैसा हूं वैसा ही बना रहना चाहता हूं... आज न सही लेकिन कभी तो ऐसी कविता संभव हो पाएगी, जिसे लिखना चाहता हूं...।