दूर देश एक शहर में एक परी उदास है..। उदास और बिमार। यहां इतनी दूर से सिर्फ उसकी लड़खड़ाती आवाज सुन पाता हूं। तकनीक ने बस इतनी भर सुविधा पदान की है हमें।
दुख की एक घायल चिड़िया बार-बार उस शहर की दिशा में उड़ती है और वापिस चली आती है।
कहने को हम आजाद हैं लेकिन हमने स्वयं को कितनी-कितनी जंजीरों में बांध रखा है।
एक साथ कई-कई उदासी, कितने दुख और कितने-कितने अकेलेपन को साथ लिए जीने के अभ्यस्त हो चुके हैं हम..।
कभी-कभी मैं शिद्दत से सोचता हूं कि कि शब्द नहीं होते और कविता का आसरा नहीं होता तो हमारे जैसे लोग कहां जाते...किसकी शरण में..।
हमारा जीना ही तो शामिल है कविता में..। हम जो जीते हैं वही कविता है...और कुछ भी तो नहीं....।
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