Saturday, September 1, 2012

एक गुमनाम लेखक की डायरी-13

कविता में अनुभव और समृतियों का क्या महत्व है। क्या बिना अनुभव के कविता लिखी जा सकती है। उसी तरह बिना स्मृति के। मुझे बार-बार लगता है कि कविता शब्द या भाषा से नहीं लिखी जाती। अगर ऐसा होता तो दुनिया के सारे लोग जो बोलना और लिखना जानते हैं वे सब कवि होते। लेकिन ऐसा नहीं है तो इसका कारण यह है कि कविता भी अन्य कलाओं की तरह एक कला है और इस कला को अभ्यास कर के सीखना होता है। अभ्यास हमें सिर्फ शब्द और भाषा को बरतना सिखाती है। बाकी चीजें जिनमें अनुभव और समृति भी शामिल है, वह हर मनुष्य के लिए अलग होती हैं। सिर्फ समृति या सिर्फ अनुभव के दम पर बड़ी कविता या बड़ी कला का सृजन लगभग असंभव है।

कविता में एक व्यक्ति का अनुभव जब बहुतों का अनुभव बन जाता है, जब एक व्यक्ति की स्मृति बहुतों की समृति  पर पड़ी धूल-गर्द साफ कर देती है, तब सही मायने में वह अनुभव और वह स्मृति कविता या कला कही जाती है।
कविता एक तरह की फ्लैश है। जैसे कैमरे का फ्लैश होता है। हमारे देखते न देखते चमक कर गायब हो जाता है। कविता भी हमारे मन में एक फ्लैश की तरह उठती है, उस फ्लैश को पकड़ना होता है। कई बार बिना फ्लैश के भी कविता लिखी जाती है, लेकिन यह जरूरी नहीं कि धुंधली तस्वीर की तरह वह और धुंधली न हो जाए। कवि को कविता में उस फ्लैश को छुपाना होता है, वह छुपा हुआ फ्लैश जब पाठक के मन में कौंधता है तो कविता कम्युनिकेट होती है। मेरे हिसाब से कविता का संप्रेषित होना सही-सही उस कविता और लिखने वाले कवि की सफलता होती है..।

यह जरूरी नहीं कि लिखे हुए हर शब्द या वाक्य में कविता हो। कविता का वह फ्लैश पूरी कविता के बीच कहीं  छुपा होता है। कई बार वह अपने आप चमक जाता है, कई बार इसके लिए कोशिश करनी होती है।

कविता की कोई उम्र होती है क्या? जैसे हमारी आपकी होती है? कविता का घर कहां होता है? कविता रोती या हंसती भी है हमारी तरह ? उसे भी गुस्सा आता है? प्यार आता है, नफरत होती है????

क्या कविता सपने में कवि को या पाठक को परेशान कर सकती हैं ? 

क्या कविता भी सांस लेती है, बिमार पड़ती है, और उसे भी दवाइयों की जरूरत होती है ?

Thursday, August 30, 2012

एक गुमनाम लेखक की डायरी - 12


और लोगों के जीवन पर कविता  का और कविता पर जीवन का प्रभाव कैसा पड़ता है, यह यहां कहना उद्देश्य नहीं है। लेकिन अपनी कहूं तो मेरे लिए कविता और जीवन दोनों साथ-साथ चलते वाले जरूरी उपादान हैं। कि जीवन पहले चलता है - कविता उसके पीछे लग जाती है। इसलिए मेरी कविताओं में हर रोज के दुख और खुशी का शामिल हो जाना मुझे कभी भी अस्वाभाविक नहीं लगता।

जैसे वह लड़का  जो मरे पास के चेयर पर बैठता है, उसे आज पहली बार वेतन मिला है, वह  हाथ में रूपये लेकर ऐसे उत्साहित हो रहा है, जैसे एक बच्चे के हाथ में  कोई कीमती खिलौना होता है। मैं लाख चाहूं तब भी उस बच्चे हो गए लड़के की हरक्कतों को इग्नोर नहीं कर सकता। उसके सहारे मैं एक दूसरे समय में पहुंचता हूं जब पहली बार मेरे हाथ में  चार सौ रूपए का एक चेक आया था। उस समय मैं कोलकाता के जयपुरिया कॉलेज में अंशकालिक प्रवक्ता था। तब हमें महीने के चार सौ रूपए मिलते थे। बैंक में अकाऊंट नहीं था। मैं उस चेक को लेकर बार-बार देखता था और उसपर गोल-गोल अक्षरों में लिखे चार सौ रूपए। मैं चाहता था कि वे लिखे हुए चार सौ जादू से चार हरे-हरे नोटों में तब्दील हो जाएंगे। उस चेक को पैसे में बदलने के लिए पहली बार बैंक में खाता खुला था, और जिस दिन वह रूपए मेरे हात में आए उस दिन मैं दुनिया का सबसे अमीर आदमी था। वह अमीरी का अहसास मुझे किसी कविता से नहीं मिला, और दूसरे अहसास कविताओं को लेकर हैं, कहानियों को लेकर हैं लेकिन पहली कमाई के हाथ में आने का अहसास इतना अद्वितीय था कि उसकी तुलना और किसी अहसास से करना बेमानी है।

मेरे पास बैठने वाला लड़का अपने नोटों को स्कैन करता है, उसे पेन ड्राइव में कॉपी करता है। वह उसे शायद जीवन भर रखना चाहता है अपने पास सम्हाल कर। मैं सोचता हूं कि उस समय मेरे पास स्कैनर होता तो शायद मैं भी ऐसा ही कुछ करता। लेकिन उन चार सौ रूपए के साथ मैं मनीषा जी से मिलने गया। हमने फूट-पाथ पर झाल मुढ़ी खाए, अंगूर खरीद कर खाया, और ढेर सारे मंसूबे बनाए। चार सौ रूपए कितने दिन तक रहते। खत्म भी हुए। लेकिन उनके होने का अहसास हमारे दिलों में हमेशा के लिए कही ठहर गया। आज इस लड़के को देखा तो एक कविता जैसा कुछ जिंदा हो गया।

कविता शब्द से नहीं बनती। जिन शब्दों को कविता में एक कवि लिखता है वे शब्द सबके पास होते हैं, लेकिन कविता सिर्फ शब्द और भाषा नहीं होती। कविता  उस लड़के के चेहरे की हंसी होती है, जो पहले वेतन को हाथ में पाकर उभरती है, मां के माथे का सकून होती है जब वह अपने बेटे के सिर पर हाथ फेरती है, लहलहाती फसल की एक किसान के चेहरे पर उभरी प्रतिबिंब होती है।

इसलिए मैं कहता हूं कि कविता को कभी भी शब्दों की मार्फत न तो समझा जा सकता है और ना ही लिखा जा सकता है। यही कारण है कि सही मायने में कविता लिखने वाले और समझने वाले संख्या में बहुत कम हैं। 

समय जितना निर्मम और अत्याचारी होता जाएगा, कविता लिखने और कविता समझने वालों की संख्या में कमी आती जाएगी। लेकिन कविता की जरूरत तब और अधिक होगी। 

..क्योंकि हर समय में कविता लिखना या कविता पढ़ना मनुष्य होने की पहली शर्त है..

एक गुमनाम लेखक की डायरी-11

मित्र लोग कहते हैं कि मैं कवि हो गया हूं। मुझे पूरा विश्वास है कि वे मुझे 'कवि' व्यंग्य में नहीं कहते। उनकी मंशा पर संदेह करने की कोई वजह नहीं है। लेकिन मेरे मन में बार-बार यह सवाल उठता है कि क्या सचमुच कुछ कविताएं लिखने से कोई कवि हो जाता है? 


मुझे लगता है कि एक पूरी उम्र बीत जाती है कविता लिखते-लिखते लेकिन फिर भी कुछ एक लोग होते हैं जो कवि बन पाते हैं। सिर्फ कविता लिखने से कोई कवि नहीं बनता। हो सकता है कि कुछ लोग दो चार कविताएं लिखकर और जोड-तोड़ कर के पुरस्कार वगैरह पा जाएं और अपनी प्रयोजित चर्चा करवा लें, लेकिन जो सही मायने में कवि होता है, वह समय की सीमा पार कर बार-बार उभर कर सामने आता है। इस समय चाहे वह किसी खोह में दबा हो, लेकिन समय आने पर वह और उसकी कविता लोगों के लिए ताकत बन कर  उभरेगी - उभरती है।

कवि  कौन है, इसके फैसले को इतिहास पर छोड़ देना चाहिए। इतिहास का हंटर सबसे मजबूत होता है, कुछ बातों को छोड़कर हमें इतिहास पर भरोसा करना चाहिए कि वह न्याय करेगा। हां, यह जरूर याद रखना चाहिए कि इतिहास भी अंततः एक मनुष्य ही लिखता है। लेकिन यह भी एक तथ्य है कि इतिहास की कुछ घटनाएं मनुष्य के कमजोर हाथ में नहीं समातीं, वह अपने तरीके से घटित होती हैं। और उनका अपना तानाशाही रवैया भी होता है।



इसलिए जब कभी मुझे कवि कहता है तो मैं झेंप जाता हूं। सिर्फ यह कारण नहीं कि अबतक की मेरी लिखी हुई कविताएं मुझे उस तरह संतुष्ट नहीं करतीं, बल्कि इसके पीछे कई अन्य कारण भी काम करते हैं- कुछ कारणों के बारे में मुझे खुद भी कुछ पता नहीं।

जब-जब मुक्तिबोध और निराला सरीखे कवियों को सामने पाता हूं, मेरा अब तक का लिखा-पढ़ा नाखून के बराबर भी नहीं ठहरता। यह मेरी विनम्रता नहीं है कि मैं ऐसा कह रहा हूं, बल्कि यह एक ऐसी सच्चाई है, जिससे मुझे हर रोज लागातार लोहा लेना पड़ता है।

मैं उन लोगों को प्रणाम करता हूं जो मुझसे भी अधिक विपरीत परिस्थियों में लिख रहे हैं, जिन्हें कोई नहीं जानता। जिन्हें अपने को जनाने की भूख भी नहीं। मैं कल शायद कवि बन भी जाऊं लेकिन वे लोग जो बिना किसी स्वार्थ के कला के कर्म में लगे हुए हैं, उनके सामने यह यह माथ हमेशा नत रहेगा..।

Tuesday, August 28, 2012

एक गुमनाम लेखक की डायरी-10

कभी-कभी सोचता हूं कि कविता क्या काम करती है। जैसे हर चीज का अपना एक वजूद और जगह नियत होता है, एक अर्थ और दायित्व होता है। उस तरह कविता का भी कोई दायित्व है?

सोचता हूं, तब अधिक, जब कोई कह दे कि यार क्या कविता को लिए पड़े रहते हो, बहुत सारे जरूरी काम हैं जीवन में करने को। मैं सोच में पड़ जाता हूं कि आज भी हिन्दी में कविता लिखने को जरूरी काम क्यों नहीं समझा गया। 

क्या सचमुच हमारे जीवन और मौजूद समय में कविता की प्रासंगिकता समाप्त हो गई है? और लोगों का कुछ नहीं जानता, लेकिन मेरे कविता लिखने के कारण मेरे गांव या घर में किसी ने मुझे सम्मान की नजर से नहीं देखा। 

मेरी कविता की पहली किताब जब प्रकाशित हुई तो सबसे पहले मैंने उसे पिता को दिखाया - उन्होंने किताब देखा और पूछा कि पैसे भी मिलेंगे? मैं चुप रह गया। कुछ देर बाद बहुत धीमें स्वर में मैंने कहा कि रॉयल्टी मिलेगी दस प्रतिशत की। मैंने यह नहीं कहा कि सौ प्रतियां मैंने खुद प्रकाशक से खरीदी हैं और उसके लिए दस हजार देने पड़े हैं। मां  अनपढ़ है, पहले चिट्ठी पढ़ लेती है लेकिन अब भूल गई है। उसने किताब के शीर्षक को पढ़ने की कोशिश की लेकिन पढ़ नहीं पाई। उसने पैसे की बात नहीं की । ढेर सारा आशिर्वाद दिया और कहा - खूब आगे बढ़ो, दुनिया में खूब नाम करो। घर का नाम दुनिया भर में बिखेरो। 


मैं मां के निर्दोष और सोझबक बातों को सुनकर अंदर तक पिघल जाता हूं। मां कविता नहीं समझती। वह अपने बेटे को आगे बढ़ते हुए देखना चाहती है।  मैं उदास हो गया हूं, उदास और अकेला। पिता ने अब तक मेरी कविताएं नहीं पढ़ीं शायद। मैंने कभी पूछा नहीं इस बारे में और उन्होंने बताया भी नहीं।

मेरा एक सहपाठी अमेरिका चला गया है। गांव में उसकी बहुत चर्चा हुई। मुझे कविता के लिए सूत्र सम्मान मिला, कहानी की किताब पर भारतीय ज्ञानपीठ का प्रतिष्ठित सम्मान मिला, यह बात मेरे घर वालों के अलावा गांव में कोई नहीं जानता। दूसरे गांव की बात तो सोचना ही बेमानी है। 

मुझसे ज्यादा लोग उस लड़के को जानते हैं जो भोजपुरी में लोक गीत गाता है।  मुझे इसका दुःख नहीं कि लोग मुझे नहीं जानते। दुख इस बात का है कि कोई एक कविता लिखता है, और उसके  लिखे को बाहर के कुछ लिखने पढ़ने वाले लोग तो जानते हैं लेकिन उनके अपने जमीन के लोग जिनके बारे में वह कविताएं लिखता है, वे नहीं जानते। यह बात मुझे बेहद परेशान करती है। 

अच्छा ठीक है कि कविता जीवन के अन्य जरूरी चीजों की तरह जरूरी नहीं लगती। लेकिन मैं यह सोचता हूं तो अंदर तक कांप जाता हूं कि क्या हम एक कविताहीन समय में रह रहे हैं। एक ऐसे समय में जब सिनेमा, टेलिविजन और तरह-तरह के गीत-गाने ज्यादा महत्वपूर्ण हैं, हो गए हैं, और कविता  इस समय एक हासिये की चीज है। हर बार इस सच्चाई का जब सामना होता है, मैं इसे स्वीकार नहीं कर पाता और गहरे सोच में डूब जाता हूं।

कविता-साहित्य के नाम पर हम लोकगीतों और तुलसी-कबीर- मीरा से आगे क्यों नहीं बढ़ पाए? मेरे गांव का वह दुलारचन जो चइता और सिनरैनी गाता है, क्या वह किसी दिन मेरी कविता को समझ पाएगा? मेरी वे बहनें मेरे भाई मेरे अपने लोग जिनके लिए इतनी दूर रहते हुए मेरे मन में एक हूक उठती है, वे किस दिन मेरी कविताओं को समझ पाएंगे।

पैंसठ साल की आजादी के बाद भी मेरे गांव के पचास प्रतिशत लोग अनपढ़ हैं और अब तक मेरे गांव में बिजली नहीं गई। वहां उस जगह कविता की रोशनी कब पहुंचेगी?

कविता का मतलब जो मैंने समझा है - वह विद्रोह है। जब आप कविता लिखने के लिए कलम उठाते हैं तो विद्रोह करते हैं, उस अन्याय के खिलाफ दो सदियों से जारी है। सच के हक में बोलने का नाम कविता है-साहित्य है, तमाम कलाएं हैं। जो उन्हें पढ़ता है वह गर्व के साथ और मनुष्य की तरह  जीना सीखता है। कविता का और काम क्या है?

मुझे पूरा यकीन है कि पिता अगर कविता को प्रेम करते तो उनसे मेरे मतभेद बहुत कम होते। 

सच्ची कविता रक्त में धीरे-धीरे भिनती है और हमारी दृष्टि को बदल कर रख देती है। समय और समाज कविता से जितना दूर होता जाएगा, वह निर्मम और मक्कार होता जाएगा। मनुष्य को मनुष्य बने रहने के लिए हर समय में कविता किसी भी चीज से ज्यादा जरूरी चीज है.. और इस बात को कहने में मुझे कोई झिझक या संकोच नहीं है...।

एक गुमनाम लेखक की डायरी-9

समय के कई हिस्से मेरे लिए तकलीफ देह हैं।  वे सपने जिसे शहर ने दिए, उनके कभी पूरे न होने का मलाल है। आज मिस्टी से बहुत दिन बाद बात हुई, वह बंगाली लड़की है जिससे मेरी मुलाकात याहू मैसेंजर पर हुई थी। तब मैं कविताओं से दूर लोक गीतों में भटक रहा था। मेरे लोक गीतों के दो अल्बम आ चुके थे। मेरे अंदर भी कहीं न कहीं मनोज तिवारी जैसा कुछ बनने का एक सपना जन्म ले चुका था। यह वह समय था जिस समय को बाद के दिनों में मैं कोमा का समय कहता हूं। 4 साल के लगभग मैंने एक भी कविता नहीं लिखी।  वे जो कारण थे उनको एक दिन फेसबुक में मैंने दोस्तों को शेयर किया था मैं चाहता हूं कि उसे आपसे भी शेयर करूं..। लेकिन बहुत  ढूंढ़ने के बाद भी वह नहीं मिलता। फिर कभी चर्चा होगी उसकी। बातों-बोतों में कई बातें निकल आती हैं। वह बात भी कभी न कभी निकल ही आएगी।

मिस्टी बहुत सुंदर नहीं होकर भी बहुत सुंदर है। वह कविता समझती है - पुस्तक मेले में जब हम दोनों बांग्ला की किताबें खरीद रहे थे तो ुसने कहा था - तुम्हारी कविता की किताब जब आएगी तो उसका बांग्ला अनुवाद मैं करूंगी। इसके बाद बहुत समय गुजर गया। हमारी बातें बंद हो गईं। और हमारे संबंधों के बीच कई एक बड़ी दिवारें खड़ी हो गईं जो उसके मेरे वसूलों की थीं। इस देश में आज भी स्त्री-पुरूष का संबंध एक जगह पर आकर बेहद जटिल हो जाता है। कहना चाहिए कि वह जटिलताएं हमारे बीच भी आईं।

हटात मैंने एक दिन  मिस्टी को मोबाईल पर संदेश भेजा।  मेरी कविता का अनुवाद करोगी? उसने  हां कहा।  लेकिन उसने यह शर्त लगा दी कि वह कभी बात नहीं करेंगी। बिना बात किए कविता की कई जगहों पर विमर्श किए यह अनुवाद संभव नहीं था। मैंने कहा कि बिना बात किए यह संभव नहीं होगा। मैं फोन करता वह फोन पर कई-कई दिन मेरी बातें सुनती रही। कोई जवाब नहीं दिया। वह मोबाइल पर संदेश भेजती- कविता के बारे में पूछती तब मैं फोन कर उसे बता देता। लेकिन आज पहली बार वह बोली।

इतने दिन बाद जवाब देना,  उसकी अवाज सुनना, कानों को अच्छा लगा।
मैं देर तक उसको कुछ कविताओं के अर्थ समझाता रहा। 
उस लड़की को लेकर मेरे मन में एक अपराध बोध भी है। मुझे कई-कई बार लगता है कि वह मुझे बेहद प्यार करती है, एक ऐसा प्यार जिसके बारे में मैंने शरत्चंद्र की कहानियों-उपन्यासों में पढ़ा है। उसकी नजर में मैं शरतचंद्र का चरित्रहीन हूं।
उसने आज कहा - मैं कभी तुमसे बात नहीं करती। तुमने पूछा न कि फिर अनुवाद क्यों कर रही हो। इसका उत्तर यह है कि मैंने वादा किया था कि तुम्हारी किताब का अनुवाद मैं करूंगी। तुम वादा कर के भूल गए। मैं वादा कर के कैसे भूलूं...।

उसकी बातें मुझे अंदर तक हिला गईं। मैं सोचने लगा क्या सचमुच मैंने मिस्टी के प्रति कोई अपराध किया है..। सोचता हूं तो सोचने का कोई छोर नहीं मिलता... अंतहीन है यह....।

Sunday, August 26, 2012

एक गुमनाम लेखक की डायरी - 8

रात बहुत बूरे सपने आए। 
पहली बार तो नहीं ही आए। अक्सर आते रहते हैं। अब अच्छे सपने नहीं आते। बुरे ही आते हैं। 

बहुत जमाने पहले के एक समय में सपने हमारे लिए सबसे अच्छे मनोरंजन के साधन थे। सुबह जब सब लोग द्वार पर इकट्ठे होते तो अपने-अपने सपने सुनाते। सबके सपने सबलोग मनोयोग से सुनते थे। कई लोग जिन्हें सपने नहीं आते थे उनका सपना सबसे अच्छा होता था। वे झूठ-मूठ सपने गढ़ लेते थे। सच्चे सपने झूठे सपने के आगे फीके पड़ जाते। हमारा बच्चा मन झूठे सपनों पर विश्वास कर लेता। सपने झूठे होते हैं, ये बाद में पता चला। रात में देखे गए और जागती ऑंखों से देखे गए सपने में तफात होता है यह हमने बाद में जाना। जानना भी कई तरह से खतरनाक होता है, इसे भी जाना जब एक लड़की ने समझाया उस कविता का अर्थ जिसे सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने लिखा था - कुछ भी ठीक से जान लेना अपने आप से दुश्मनी ठान लेना है।

हमने पुराने जमाने के सपनों को एक-एक कर मिटते-ढहते देखा। हमारे सपने में परियां नहीं थी। महल नहीं थे। राजा-महाराजा के सपने नहीं थे। हमने ढेर सारी पसंद की मिठाइयां  खाने के सपने देखे। सिपाही की नौकरी और कुछ पैसे के बाद मां पिता को तीरथ-वरत कराने के सपने देखे। हमने यह भी सपने में देखा कि हमने जो आम का अमोला रोपा था, वह वृक्ष बन गया है, बड़ा सा और उसमें ढेर सारी मंजरियां उग आई हैं। अमरूद का वह पेड़ जो कभी बड़ा नहीं हो सका- वह बड़ा हो चुका है और ओझा बाबा के यहां नाली से निकालकर और धोकर अमरूद खाने से हम बच गए हैं।  कि हमारे गांव तक आने वाली सड़क जो बरसात के दिनों में कीचड़ की वजह से बंद हो जाती थी, वह अब पक्की की बन गई है और एक हरे रंग की सायकिल पिता ने खरीद कर दिया है और हम सब उस सायकिल को बारी-बारी चला रहे हैं। सबसे तेज मैं सायकिल चलाता हूं के सपने बार-बार रात में आते थे।

हमने कविताओं के सपने नहीं देखे। देवताओं के सपने नहीं देखे। पता नहीं और कितनी जरूरी चीजों के सपने नहीं देखे। उन्हीं सपनों के साथ एक दिन हमें कोलकाता लाया गया- यह तर्क देकर कि हम वहां गांव में नान्हों की संगत में बिगड़ रहे हैं। यहां आकर हम एक कमरे में बंद हो गए।

तब हमारे सपने में रेलगाड़ी आती थी जो हमारे गांव की ओर जाती थी। तब हमारे सपने में सपने सुनाने वाले गिरिजा, ददन, सुरेश, हीरालाल और सुरजा सब आते। तब हम सपने में अपने गांव में होते।

आज का सपना बहुत बुरा था। 
लेकिन क्या ही अचरज है कि  मैं सपने में अपने गांव में था। मेरे सपने में कुछ लोग थे जो शहरी लगते थे, उनके हाथों में अत्याधुनिक ढंग के हथियार थे, जिनके नाम मैं नहीं जानता। वे मेर पीछे पड़े हैं। वे मुझे मार डालना चाहते हैं। मेरे पिता मुझे बचाने के लिए मुझे कोनसिया घर में बंद कर चुके हैं। मैं अपने पुराने घर के खपड़े से होते हुए गांव की गली में कहीं खो जाता हूं। गांव की सारी गलियों के बारे में मुझे पता है। मैं भिखारी हरिजन के घर में हूं। उनकी  अधेड़ पत्नी मुझे अपने हाथों से गुड़ की चाय पिला रही है।

भागते समय मैं कुछ भी लेकर नहीं भागता। मेरे हाथ में किताबें हैं। कुछ देर बाद देखता हूं कि मैं नदी के किनारे हूं और उस नदी का नाम हुगली नदी है। मुझे एक आदमी मिलता है जो बोट चला रहा है, मुझे उस पार जाना है, वहां उस पार मेरा एक घर है। मैं देखता हूं कि वह बोट खेने वाला आदमी अचनाक  पुलिस में बदल जाता है। वह मेरी किताबें छिनना चाहता है। मैंने जो कविताएं लिखी हैं उसे छिनकर गंगा में बहा देना चाहता है। 

मैं भागता हूं, बेतहासा और और नदी में उतर जाता हूं। नदी में डूब्बी मारता हूं। और देखता हूं कि अपने गांव के भागर में हूं। वहां मेरे बाबा खड़े हैं। ुनके हाथ में रामचरितमानस है। उनके वस्त्र साधुओं की तरह है। उन्हें देककर उनके जिंदा होने पर मुझे अचरज होता है। मैं देखता हूं कि मेरी किताबें भीग गई हैं। लिखे हुए अक्षर की सियाही पन्नों में फैल गई है...। मैं बाबा को प्रणाम भी नहीं करता और धूप-धूप चिल्लाते हुए आगे बढ़ जाता हूं...।

सुबह से यह सपना मुझे परेशान किए हुए है। मां से कहा- मैंने बुरा सपना देखा आज। मुझे मत कह मझला, पानी में जाकर कह। बुरे सपने पानी में कहने से उनका दोष नष्ट हो जाता है। 

मैं ऑफिस के रास्ते हुगली नदी को देखता हुआ गुजर जाता हूं। हुगली नदी को प्रणाम करता हूं, अपना बुरा सपना नहीं कहता। सोचता रह जाता हूं और पहली-दूसरी गाडी छोड़कर तीसरी गाड़ी में सवार हूं..।

घड़ी देखता हूं और सोचता हूं...- आज फिर ऑफिस देर से पहुचूंगा।

एक गुमनाम लेखक की डायरी - 7

कभी-कभी लगता है कि पूरा दमाग शब्दों से खाली हो चुका है, एक भी शब्द नहीं बचा इस पूरे संसार भर में। हम मौन हो गए हैं कि फिर से उस आदिम युग में चले गए हैं जहां हम संकेतों में बात करते थे। इतना बोला और कहा गया है कि  अब बोलने कहने की हिम्मत नहीं होती कई बार। हम एक ही समय में एक सभ्य और एक आदिम युग में कैसे रह और जी सकते हैं, यह एक कलाकार से अधिक कौन समझ सकता है...।

और कलाकार क्या कोई ईतनी आसानी से बन सकता है।  कविताएं लिखने वाले क्या हर शक्स को कवि कहा जा सकता है, गाने वाले को गायक या लिखने वाले को लेखक। मेरे लिए कवि बनने और कलाकार बनने में एक पूरी उम्र खर्च हो जाती है, फिर कोई एक बिरला कवि-कलाकार बन कर उभरता है। खत्म हो जाती हैं नस्लें, नाम गुम जाते हैं, केन्द में चमकने वाले नामवर लोग समय की अंधेरी खाइयों में अलोपित हो जाते हैं, टिके रह जाते हैं कुछ लोग जो सचमुच के लोग होते हैं और उनकी कला  और कविता हर समय की जरूरत बन जाती है। मैं एक गुमनाम लेखक-कवि {?}ये सारी बातें सोचूं भी तो कैसे। हूं पर नहीं  नहीं..। मैं सिर्फ शब्दों से प्यार करता हूं... और शब्दों से प्यार करते हुए कोई कितना दूर जाएगा...। 

मेरा एक कहने को घर है और इतनी सारी जिम्मेवारियां और एक बड़ी जिम्मेवारी इस मिट्टी के लिए भी है, जिसकी धूल मेरे शरीर में आज भी घंसी हुई है।

मैं कवि-कलाकार बनने के लिए कभी लिखूं भी तो कैसे। यह चाहत मेरे भीतर आए भी तो कैसे...?

मैं तो अपनी मिट्टी का कर्ज चुकाने के लिए लिखता हूं। मेरे बड़े भाई तो इलाज के अभाव में मर गए और उनका तो छोटा मोटा इलाज भी हुआ लेकिन उनके बारे में जब सोचता हूं जिनके घर कई-कई शाम चूल्हे नहीं जलते, इलाज की बात तो दूर,  तो अपने कवि होने पर शर्म आती है। 

एक कविता तो ऐसा लिखूं जिसमें शब्द न हों, कला न हो, लय और तमाम कविता के लिए जरूरी चीजें न हों, लेकिन वह कविता मेरे गांव के सबसे गरीब परिवार के घर चूल्हे में आग की तरह जले, तसली में चावल की तरह डभके... एक बच्चे के चेहरे पर हंसी की तरह खिल-खिल आए। और एक भूखी आंत में पहुंच कर रक्त के रूप में तब्दील हो जाए। 

उसके पहले अगर मुझे कोई कवि मानता हैं तो मानता रहे, मुझे अपने लिखने पर तब भी अफसोस ही रहेगा....।