Wednesday, October 31, 2012

एक गुमनाम लेखक की डायरी- 33


मेरी मां कविताएं नहीं समझती। कहानियां भी नहीं। पढ़ नहीं पातीं। पहले पढ़ती थीं -अब पढ़ना भूल चुकी हैं।

कभी-कभी सोचता हूं कि अगर मैं भी नहीं पढ़ पाता तो कितना अच्छा होता - मां की कई बातें जो मेरी अनपढ़ बहनें समझ लेती हैं- मैं भी समझ लेता। वह जो मेरे और उसके दरम्यान शब्दों की एक अदृश्य दीवार बन गई है - वह नहीं बनती।

कई बार मैं और पिता जब किसी बात पर बहस कर रहे होते हैं तो वह टुकूर-टुकूर देखती है। सुनती है - समझने की कोशिश जब बेकार हो जाती है तो फिर से उसी तरह देखने लगती है। उसे दुख नहीं होता कि वह समझ नहीं पाती - उसके चेहरे पर मेरी बातों को सुनकर एक ऐसा भाव आता है जिसको शब्दों में बांधन मेरे जैसे गुमनाम लेखक के लिए कत्तई संभव नहीं - शायद यह मैं कभी न कर पाऊं।

मां आज भी रोती है - जब हम बहुत दिनों बाद उससे मिलने हंकासे-पियासे पहुंचते हैं अपने गांव। मां हमें देखकर रोती है। उसके रोने में हम उसके खुस होने की तस्वीर देखते हैं। फिर जब लौटना होता है - हम लौटते हैं और वह रोती है। और कोई नहीं - सिर्फ वही रोती है। उसका रोना तब हमें द्रवित करता है - अपने शहर में बस जाने पर खीझ होती है। 

मैं चाहता हूं कि मैं भी उससे लिपट कर रोऊं, लेकिन पता नहीं क्या मुझे ऐसा करने से रोक देता है। बहुत पहले के समय में हमारा रोना याद आता है- जब बहुत खोजने पर मां घर में नहीं मिलती थी। शायद हमसे तंग आकर कहीं छुप जाती थी। और जब वह मिलती थी तो हम उससे चिपट कर रोते थे। लेकिन अज जब अलग होते हैं तो रो नहीं पाते। चिपट नहीं पाते उससे।

यह एक अघोषित दूरी क्योंकर पैदा हो चुकी है - वह क्या है जो रोकता है ऐसा करने से। समझ नहीं आता।

कभी-कभी  मैं देखता हूं कि जब कोई काम नहीं होता मां के पास।  आंखें धुंधला गई हैं - मोतिया के धब्बे पड़ गए हैं - वह चुपचाप एक कोने में बैठकर मेरी कविता की एक किताब को हाथ में लिए उसके एक-एक शब्दों को सहलाती है - महसूसती है।

मैं सम्हाल नहीं पाता खुद को मां का यह रूप देखकर। और चुपचाप एक कोने में खड़ा होकर खूब-खूब रोता हूं।

कुछ देर बाद मां के सामने खड़ा होता हूं। मां किताब छुपा लेती है। वह नहीं चाहती कि उसकी इस एकांत क्रिया में कोई  बाधा हो। और मैं देखूं उसके इस क्रिया को।

सोचता हूं कि मां एक दिन नहीं रहेगी।  हो सकता है मेरी कविताएं बहुत सारे लोग पढ़े। लेकिन जिस तरह मां अकेले में पढ़ती है मेरी कविताएं - ठीक वैसे ही कभी मेरी एक भी कविता को कोई पढ़ पाएगा ?

यह सोचना मेरे लिए कितना दारूण है - यह क्या कभी बता पाऊंगा शब्दों की मार्फत? ।शायद नहीं। शायद क्यों - नहीं ही बता पाऊंगा। मां के वे स्पर्श मेरी कविताओं पर हमेशा रहेंगे - किसी ईश्वर की छाया की तरह...।

1 comment:

सिद्धार्थ सिंह बघेल said...

बिमलेश जी! आपकी पोस्ट तो काफी समय से फेसबुक में देखता रहता था, पर सच कहूँ तो उन पोस्टों को सिर्फ मैं आत्मप्रचार ही समझता था और कभी मन से कभी बेमन ही लाईक कर दिया करता था, मगर आज अचानक आप के ब्लॉग पर पहुचकर जब आपके इन डायरियों के अंशों को पढ़ा तो मैं प्रभावित हुये बिना न रह सका और चंद शब्दों की यह टिपण्णी लिखने से खुद को रोक न पाया| प्रभु आपको निरन्तर सृजनरत रहने की शक्ति दे यही आपके इस अनुज की दुआ है ...